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सागर और चांदनी

Posted On: 20 Mar, 2010 में

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तन्हा था विशाल सागर ,

एक रात, रूप की गागर .

छलकती   हुई    चांदनी ,

गाती हुई कोइ  रागिनी .

आई   थी     उधर   से ,

निकला चंदा जिधर  से .

सागर    सहम   सा     गया ,

लहरों का दौर थम सा गया .

कौन    है      ये     चंचला ?

जिसकी ओर ये मन  चला .

बिल्कुल   चाँदी    के  जैसी ,

क्या    कंहूँ    के        कैसी ?

लगती      है      परी –सी ,

थोड़ी – थोड़ी     डरी        सी .

सोचा सागर तो निष्प्राण है ,

इसके तन  मे  नहीं जान है .

छुआ चांदनी ने  समुन्दर ,

चेतना आई उसके अन्दर .

कोमल   सा स्पर्श  पाकर ,

सारे  कष्ट      भुला    कर .

सागर   आनंदित     हुआ ,

रोम- रोम  पुलकित हुआ .

बोला- आई  हो कंहा  से ?

नयी  हो   इस    ज़हां में ?

दोस्ती क्या मुझसे करोगी ?

कुछ    पल मेरे संग रहोगी ?

ऐसे   खिल   गयी  चांदनी ,

कि छटा कुछ   ऐसी    बनी .

खिल  गया   सागर का मन ,

चाँदी हो गया उसका भी तन .

फिर  चांदनी  ने नेत्र झुकाए ,

सर हिलाके, पल    के गिराए .

समझा   दी     नैनों   की   भाषा ,

कर दी व्यक्त अपनी अभिलाषा .

झूम उठा सागर का  मन ,

आना    था   ये   भी क्षण .

मेरे      उजाड़    जीवन    में ,

क़ि बसेगी चांदनी मन में .

हो गए दोनों एक उसी पल ,

लहरें ,   जो कि थी  विकल .

उस  समय, थम  सी    गयी ,

मस्ती जहाँ में रम सी गयी .

बेआसरे    को सहारा    मिला ,

भटके हुए को किनारा मिला .

मिला  तब सागर को चैन ,

आई ,     कैसी     ये    रैन ?

मान    ले      मेरी       बात ,

तू न ख़त्म होना हे   रात !

अरे,   रात  होकर      भी ,

रोशनी से दूर  होकर  भी .

तूने,    ये  क्या  किया ?

उजाला  मुझको    दिया .

अहसान    तेरा, हे  निशा !

जो उपकार मुझपे किया .

अम्बर    हुआ       प्रसन्न ,

खिल उठा धरती का मन .

देखा   जो  उनका  मिलन ,

शीतल हुए दोनों के नयन .

मगर.. शायद विधाता को ,

जग  के  जन्म- दाता को .

ये  सब     मंज़ूर   न   था ,

विरह दिन भी दूर न   था .

देता है जो सब  को शक्ति ,

होती    है   जिसकी   भक्ति .

कष्ट  भी  दे सकता है जो ,

नष्ट भी कर सकता है जो .

आ गया तब वह दिनकर ,

चली      उससे       डरकर .

चांदनी,   सागर को  छोड़ ,

प्रीत के    बंधन  को  तोड़ .

बोली- तुम्हे तो तपना है ,

कष्टों      में     जलना    है .

फिर    मैं    क्यूं       जलूं ?

कंही और   क्यूं न चलूँ ?

अवाक..   रह गया सागर ,

अरे , मुसीबत  से डरकर .

मुझे      छोड़    जाती  हो ?

वादे सभी तोड़ जाती हो .

मेरी चांदनी !     मत जा ,

मुझ पर   कुछ तरस खा .

रहूँगा   कैसे   तेरे  बिना ?

जिऊंगा कैसे तेरे  बिना ?

तेरा   वो     स्पर्श  शीतल ,

ठंडक पता  था मेरा जल .

चांदनी ! निष्ठुर न बन ,

तेरे  बिना   मेरा   मन .

बिलकुल मुरझा जायेगा ,

मुझसे   रहा न जायेगा .

मित्रता     को      तोड़कर ,

विपत्ति    में      छोड़कर .

जो    यूं    चले जातें  हैं ,

बुजदिल ही  कहलाते  हैं .

क्या तू   इतनी  कमज़ोर है ?

या तेरे मन में कुछ और है ?

इतनी   सी    मुश्किल   से ,

डरकर मेरे       दिल     से .

दूर    हुई        जाती        है .

क्या लाज नहीं आती है ?

नहीं चांदनी! भयभीत होकर ,

मत  जा   मुझे     छोड़      कर .

कष्ट    ये    सदा   ना     रहेंगे ,

सुख  भी     हमको  मिलेंगे .

सदा      कष्ट     रहता     नहीं ,

क्या  ज़माना   कहता   नहीं ?

चांदनी !      कायर  बनकर ,

थोड़े    से  कष्ट     से   डरकर .

कर   के   बरबाद  मुझे ,

क्या      मिलेगा    तुझे ?

बोली  वो फिर    जाते हुए ,

व्यंग्य   से  मुस्काते   हुए .

अरे सागर ! नादाँ बनकर ,

और,    तेरे   संग  रह कर .

मुझे      क्या        मिलेगा ?

अरे,    तू     तो       जलेगा .

मुझे           भी     जलाएगा ,

अपने    संग        रुलाएगा .

पहले     भी      था   तनहा ,

कौन         था      यंहा ?

कुछ     पल   को आई थी ,

मार्ग शायद भूल आई थी .

अच्छा !   अब जा रही हूँ ,

और हाँ !   कह रह रही हूँ .

अपना    ध्यान     रखना ,

ना मुझे    याद      करना .

हाय !  सागर   बेचारा ,

किस्मत    का       मारा .

हो गया  फिर  मौन ,

धीरज,     बंधाये कौन ?

कौन दे उसको सहारा ?

जो  किस्मत  से    हारा .

अरे सागर ! नासमझ !

अब  तो  कुछ    समझ .

तेज़   धूप     में   भला ,

तू   अकेला     ही    जला .

अकेला      सदा     रहा ,

सब कुछ  सहता   रहा .

अब      भी     सह   ले ,

पहले की  तरह रह ले .

क्या तू जानता नहीं ?

सब     जाते   है    वहीँ .

जहाँ  उन्हें खुशियाँ  मिले ,

दुनिया का हर सुख मिले .

ऐसा    क्या तेरे पास था ?

जो     उसे    दे    देता .

वो सदा     खुश   रहेगी ,

दूर      दुखों    से     रहेगी .

यही ख़ुशी क्या कम है ?

फिर बता क्या गम  है ?

चांदनी न तेरी कभी थी ,

कुछ  पल की सखी थी .

छोड़, मत    कर     छोह ,

तोड़  दे अपना      मोह .

उसे न     अब याद   कर ,

वो न आएगी अब लौटकर …………….


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