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अभिलाषा

Posted On: 11 Mar, 2012 Others में

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अभिलाषा

हे अनन्त !

कराकर मुक्त ‘अन्त’ से,

खींच लो अपनी ओर.

ले   चलो   उस   छोर,

जहाँ अन्त का भय न हो,

आदि का विस्मय न हो.

हे ज्योतिपुंज !

कब    तक   रखोगे?

इस भयावह तिमिर में,

ले चलो उस शिविर में.

जहाँ प्रकाश ही प्रकाश हो,

चित्त न कभी उदास हो.

हे दिव्यरूप !

हटा दो मिथ्या का आवरण,

खिल जाए ज्ञान की धूप,

दिखा दो सत्य का रूप.

स्वयं को भूल जाऊँ,

तुम से एकरूप हो जाऊँ…

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chandanrai के द्वारा
March 12, 2012

आदरणीय जय जी, सादर नमस्कार! दिखा दो सत्य का रूप. स्वयं को भूल जाऊँ, तुम से एकरूप हो जाऊँ… अद्भुत भाव http://chandanrai.jagranjunction.com/Berojgar

    jai... के द्वारा
    March 12, 2012

    नमस्कार चंदनजी , पंक्तियाँ आपको अच्छी लगी…… आभारी हूँ आपका…..

dineshaastik के द्वारा
March 12, 2012

आदरणीय जय जी आपकी सुन्दर भावों को अभिव्यक्त करती रचना को समर्पित पंक्तियाँ…… किसे पुकार रहे हो दोस्त जो नहीं है, अपने अंदर झांककर देखो वही है, मैंने भी बहुत पुकार कर देखा नहीं आया, माँ के चरणों को देखा, वहीं पाया।

    jai... के द्वारा
    March 12, 2012

    धन्यवाद दिनेश जी, सही कहा आपने माँ के चरणों में तो स्वयं ईश्वर भी शीश झुकाते हैं..

March 11, 2012

सादर नमस्कार! आत्म दर्शन का बोध कराती हुई पंक्तियाँ, इश्वर के सम्मुख करती है….. हटा दो मिथ्या का आवरण, खिल जाए ज्ञान की धूप, . दिखा दो सत्य का रूप. स्वयं को भूल जाऊँ, तुम से एकरूप हो जाऊँ…….हार्दिक आभार!

    jai... के द्वारा
    March 12, 2012

    नमस्कार अनिल जी, रचना आपको अच्छी लगी, बहुत बुहत शुक्रिया………

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 11, 2012

बहोत ही मोहित करती आपकी ये अभिलाषा …………बधाई हो

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 11, 2012

    बहुत सुन्दर कविता.आपकी ”सागर और चांदनी” कविता भी बहुत अच्छी है. हटा दो मिथ्या का आवरण, खिल जाए ज्ञान की धूप, दिखा दो सत्य का रूप. स्वयं को भूल जाऊँ, तुम से एकरूप हो जाऊँ… सुन्दर पंक्तियाँ.

    jai... के द्वारा
    March 12, 2012

    धन्यवाद मोहित जी………….

    jai... के द्वारा
    March 12, 2012

    धन्यवाद राजीव जी. आपको ये पक्तियाँ अच्छी लगी, आभार आपका………. सागर और चाँदनी आपको पसंद आयी इसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया….अब से करीब दस वर्ष पहले मैंने ये रचना लिखी थी. एक बार में ही. लिखने के बाद मुझसे एक भी शब्द इसमे बदला नही गया… शब्दश: यह रचना मूल रूप में ही है..

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 11, 2012

निराकार में एकाकार होने की प्रवल वांछा | बहुत अच्छा | बधाई !!!

    jai... के द्वारा
    March 12, 2012

    विजय जी, आपका स्नेह मिला, बहुत अच्छा लगा ….. बहुत बहुत धन्यवाद…..


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